Posts

Showing posts from May, 2018

यादें बचपन की...| (चल फिर बच्चे बन जाते हैं) | yadain | yade bachapan ki hindi poem... By - Nandkishor Patel (नन्दन))

चल फिर बच्चे बन जाते हैं, चल फिर बच्चे बन जाते हैं.... भूल यहां कीं चिंताएँ सारी, चल फिर खेलन जाते हैं,  बिन-लये, बिन-ताल पुराने गीत वही हम गाते हैं, आ फिरसे हम गाते-गाते तुतलाते हैं,  चल फिर बच्चे बन जाते हैं, चल फिर बच्चे बन जाते हैं ....|| 1 ||
चाह जवानी के लालच में, बचपन भूल कहीं हम जाते हैं, और कमाने की चाहत में, इसको भी छोड़ यहीं हम जाते हैं, उमर होती है 55 की, और एक कहानी आधी रह जाती है, 25 में भी न कुछ कर पाये, यही जवानी कह जाती है, यादें आती हैं बचपन की, फिर नयनो से अश्क़ निकल आते हैं चल फिर बच्चे बन जाते हैं, चल फिर बच्चे बन जाते हैं ....|| 2 ||
सरकन की वो पाटी, याद बहुत अब आती है, आ फिर उस पाटी पर आज सरक कर आते हैं, ऐसे लगता माँनो  वो बगिया वो पेड़ अबभी हम बुलाते हैं, छोड़ आये थे हम जो वो कंचे मैदानों में, आ चलकर अब उन कंचों में चोट लगते हैं, चल फिर बच्चे बन जाते हैं, चल फिर बच्चे बन जाते हैं ....|| 3 ||
जो कल किलकारी से गूँजा करतीं थीं, अब वीरान पड़ी हैं वो गलियां, आ चलकर खेलें गिल्ली-डंडा, फिर इन गलियों में शोर मचाते हैं, आ मेरे घर पर सब मिलकर कुछ मीठा आज बनाते हैं, चल तेरे बड्डे…

माँ तो माँ होती है/ma to ma hoti he/mother's day special poem 2018 by - नंदकिशोर पटेल "नन्दन"

Image
माँ तो माँ होती है... सच में....माँ तो माँ होती है.... बिठा बिठा कर गोदी में, हर बार अलग कुछ समझती है, नक़ी कर नेकी होगी यही हमें सिखाती है, जब हम उसकी न सुनते है, अपनी इच्छा पूरी करने, माँ से लड़ते और झगड़ते हैं, वो कह-कह जब हमसे थक जाती है तब जाकर पापा के पास शिकायत जाती है, पापा हमें मारने जब-जब छड़ी उठाते हैं, तब फिर वो ही हमें बचाती है वो बच्चों के लिए सबसे लड़ जाती है...
माँ तो माँ होती है... सच में....माँ तो माँ होती है.... ||1||
बेशक़ उसने बचपन में हमें मारा होगा, डाँटा होगा, ललकारा भी होगा, पर हम शायद समझ नहीं पाते हैं, उसमें भविष्य हमारा और, माँ का प्यार छुपा होता है, इक माँ अपने बच्चों का भविष्य बनाने वो अपने दिल पर पत्थर रखकर, ये सब कर पाती है खुद से भी कई ज्यादा, बच्चों की चिंता उसे सताती है...

माँ तो माँ होती है... सच में....माँ तो माँ होती है....||2||
बच्चों को पीड़ा में कैसे देख भला वो सकती है गन्दे होने पर भी वो आँचल में, छुपा लिया करती है, माँ का ये आँचल, गर्मी में शीतलता की छाँव दिया करता है, वारिश में रेनकोट और सर्दी में, स्वेटर की तरहा महसूस हुआ करता है सच में वो पल जन्नत से …