Posts

Showing posts from June, 2019

जिद और जोश - दिव्यांगता बाधा नहीं, अपनी जिद और जज्बे से दे रहे समाज को प्रेरणा। नंदकिशोर पटेल।

Image
दिव्यांगता बाधा नहीं, अपनी जिद और जज्बे से दे रहे समाज को प्रेरणा।
इनके जोश और जज़्बे को सलाम

छतरपुर। नंदकिशोर पटेल।
दिव्यांगता जीवन में बाधा नहीं है इसका एक नजारा शहर में देखने को मिलता है। दिव्यांग ही दिव्यांगों के हुनर को निखार रहे हैं और उन्हें जीवन जीने की कला सीखा रहे हैं।
अनंतराम विश्वकर्मा:अनंतराम विश्वकर्मा जन्म से दृष्टिहीन हैं। लेकिन अपने जोश और जज्बे से ये साबित कर लिया कि दिव्यांगता जीवन मे कोई बाधा नहीं है। अनंतराम जन्म से ही दृष्टिहीन हैं वो देख नहीं सकते लेकिन इसके बाबजूद उन्होंने अपना हौसला बनाएं रखा। अनंतराम को ब्रेललिपि और संगीत के साथ-साथ सितार, हारमोनियम, तबला और बाँसुरी के साथ संगीत के कई उपकरणों को बजाने में महारत हांसिल है। अनंतराम दृष्टिहीन बच्चों को ब्रेरेललि और दिव्यागों को संगीत और संगीत यंत्रों को चलाना सिखा रहे हैं। वे कहते हैं कि दृष्टिहीनता हमें रोक नहीं सकती है, हम जो चाहते हैं वो कर सकते हैं बस मन में कुछ करने की प्रबल इच्छाशक्ति होनी चाहिए। मैं ब्रेललिपि और संगीत की अपनी कलाओं को बच्चों को सीखकर उन्हें एक नया जीवन देना चाहता हूँ। जिससे वे खुद को समाज से …

किसानों के दर्द की कहानी कविता में..' ओ मेघा इस साल बरस जा रे ' । नंदकिशोर पटेल "नन्दन"

Image
ओ मेघा इस साल बरस जा रे...ओ मेघा इस साल बरस जा रे...||
अब तो अम्बर के शिखरों से जमीं पर आ रे  तेरी उम्मीदों में किसानों को फाँसी लगती है आज धरा पर आ, इन मौतों को रुकवा रे... ओ मेघा इस साल बरस जा रे...ओ मेघा इस साल बरस जा रे...||1||
तेरे न आने से किसानों पर कितनी विपदायें आन पड़ी हैं... देख जरा उनके पैरों को...कर्ज की जंजीरें बहुत बड़ी हैं वारिश की उम्मीद लगाएं वो एक वक़्त की रोटी खाये खड़ा रे... ओ मेघा इस साल बरस जा रे...ओ मेघा इस साल बरस जा रे...||2||
सूखे खेतों में बैल भला हल कैसे खींचेंगे..? लहू बहा कर अपने जिश्म का... कृषक खेतों को कैसे सीचेंगें, अब उम्मीदें टूट रहीं हैं तेरे आने की उम्मीदों में मेरी साँसे छूट रहीं हैं, उम्मीदों को ताकत दे..साँसों को साँसे दे जा रे... ओ मेघा इस साल बरस जा रे...ओ मेघा इस साल बरस जा रे...||3||
जब उसने देखा आसमान में चहरे पर घोर उदासी छाई है, कई रोज़ हुए हैं उसने रोटी तक न खाई है, उनकी खुशियों पर घोर निराशा के काले बादल छाये हैं... न जाने कितने रस्सी पर झूले, तेरे पास शिकायत लेकर आये हैं खूंटे पर हल, आँगन में बैल तुम्हारी राहें देख रखा है इन बेचारों पे अबकी …

बुलदेलखण्ड_में_फिर_एक_अलग_नजारा। पलास के पत्तों की टोपी लगा कर गर्मी से कर रहे बचाव। अजब स्टोरी।

Image
अजब बुंदेलखंड की गजब कहानीनंदकिशोर पटेल
7000176647

बुलदेलखण्ड_में_फिर_एक_अलग_नजारा :- 
जहाँ से विकास के नाम पर गांवों को छोड़कर शहरों की पलायन किया और उसी तरह पहले के देसी तरीकों ओर नुस्खों को छोड़ कर हम फैशन के नाम पर दिखावा करने लगे। इतना ही नहीं इसके अलावां हमनें प्रकृति की इतना दमन किया कि आज प्रकृति आपदायें आम बात हो गईं है और प्रकृति के ऐसे ही प्रकोपों से बचने के लिए अब गांवों के लोग फिर अपनी पुरानी सभ्यता और संस्कृति की और अग्रसर हो रहें हैं और प्रकृति के दिये साधनों का पुनः उपयोग करने लगे हैं।
ऐसी ही एक कहानी सामने आई है जिसे हमारे भास्कर ने लोगों तक पहुँचाया और एक प्रयत्न किया है कि लोग इस दिखावे को छोड़कर प्रकृति का दोहन न करे।

यह घटना कल करीब 2 बजे की है मैं खबर लेने जा रहा था कि अचानक मेरी नजर एक पिपरमेंट के खेत मे निदाई करने वाले कुछ किसानों पर पड़ी। मैने अपनी गाड़ी रोकी और जाकर देखा तो पाया कि वो प्रकृति के दोहन से असंतुलित हुई मौसम की प्रक्रिया में आग बरसने वाली गर्मी से बचने के लिए छेवला यानी पलास के पत्तों से एक टोपी बनाई और उसका उपयोग इस प्रकृति के प्रकोप से बचने के लिए कर रह…