बुलदेलखण्ड_में_फिर_एक_अलग_नजारा। पलास के पत्तों की टोपी लगा कर गर्मी से कर रहे बचाव। अजब स्टोरी।

अजब बुंदेलखंड की गजब कहानी

नंदकिशोर पटेल
7000176647

बुलदेलखण्ड_में_फिर_एक_अलग_नजारा :- 


जहाँ से विकास के नाम पर गांवों को छोड़कर शहरों की पलायन किया और उसी तरह पहले के देसी तरीकों ओर नुस्खों को छोड़ कर हम फैशन के नाम पर दिखावा करने लगे। इतना ही नहीं इसके अलावां हमनें प्रकृति की इतना दमन किया कि आज प्रकृति आपदायें आम बात हो गईं है और प्रकृति के ऐसे ही प्रकोपों से बचने के लिए अब गांवों के लोग फिर अपनी पुरानी सभ्यता और संस्कृति की और अग्रसर हो रहें हैं और प्रकृति के दिये साधनों का पुनः उपयोग करने लगे हैं।


ऐसी ही एक कहानी सामने आई है जिसे हमारे भास्कर ने लोगों तक पहुँचाया और एक प्रयत्न किया है कि लोग इस दिखावे को छोड़कर प्रकृति का दोहन न करे।



यह घटना कल करीब 2 बजे की है मैं खबर लेने जा रहा था कि अचानक मेरी नजर एक पिपरमेंट के खेत मे निदाई करने वाले कुछ किसानों पर पड़ी। मैने अपनी गाड़ी रोकी और जाकर देखा तो पाया कि वो प्रकृति के दोहन से असंतुलित हुई मौसम की प्रक्रिया में आग बरसने वाली गर्मी से बचने के लिए छेवला यानी पलास के पत्तों से एक टोपी बनाई और उसका उपयोग इस प्रकृति के प्रकोप से बचने के लिए कर रहे हैं। जब उनसे मैंने पूछा कि इससे क्या होता है तो किसान पुट्टू यादव ने बताया कि हमारे द्वारा इतने अधिक पेड़ पौधे काटने के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है इसके कारण इतनी अधिक गर्मी पड़ रही है। इस गर्मी से बचने के लिए हमने प्रकृति का ही सहारा लिया है छेवला यानी पलास के पत्तो को बुनकर सर कर ढकने के लिए टोपी जैसी आकृति की संरचना दी और सर व कानों को ढक कर खेतों में काम करते हैं इससे सर में गर्मी न के बराबर लगती है।तो इस प्रकार ये ग्रामीण गर्मी से बचने के लिए प्रकृति का ही उपयोग कर रहे हैं और इससे निजात पाने के प्रयासों में लगे हैं।


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