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Maa/माँ (ममता की मूरत)/For Mother

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प्यासे को नदिया है,डूबे को किनारा है
माँ ममता की मूरत है, स्नेह की बहती धारा है||

    पकड़ के उँगली माँ की हमने,
       पहला कदम बढ़ाया है|
    जब भी भूख लगी बचपन में,
उसने ही अपना स्तनपान कराया है|
      जब-जब हम गिरे धरा पर,
          उसने हमें उठाया है|
        निश्चय बचपन में हमने,
         माँ को बहुत सताया है|
        हमने उसे रुलाया लेेकिन,
           उसने हमें हँसाया है|
        मैंने बैठ उसी की गोदी में,
       जीवन का अनुभव पाया है|
      इस दुनिया की तपती माया में,
         माँ एक शीतल छाया है|
    प्रथ्वी तो क्या,सम्पूर्ण लोको में,
  माँ का किरदार ही सबसे न्यारा है|

प्यासे को नदिया है,डूबे को किनारा है
माँ ममता की मूरत है, स्नेह की बहती धारा है||1||

    उसके चरण कमल की धूल लगा,
        हो जाता पावन माथा है|
       सागर को स्याही बना लें,
        वृक्षों की कलमें लगा लें,
       अम्बर भी कम पड़ जाये,
 लिखने को, इतनी उसकी गाथा है|
     येनन्दनतो एक बालक है,
   दाता भी गाता जिसकी गाथा है|
  ईश्वर भी बारम्बार जन्म धरा पर लेता,
                   क्योकि,
 उसको भी अांचल माँ का प्या…

मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है |

मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है |

            भरी जवानी में,

        जो बेटा-बेटा करते थे,

          अपने दुखी बुढ़पे मे,

उनके बेटों को सुख से सोते देखा है |

   नफरत करते थे, जिस बेटी से,

  आज रात उसे, उनके सिरहाने
        बैठा रोते देखा है |

मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है ||1||

व्याह हुआ ससुराल गई,

अनजानों में वहां लुटाने , वो अपना प्यार गई,

वीरानों में खड़ा किया, उसने अपना मधुवन है ,

अनजानों से भी उसे, कितना अपनापन है |

फिर भी नहीं पूछता कोई क्या उसका मन है,

        उसके मुस्काते चहरे में,

   मैंने उसके एकाकीपन को देखा है |

   मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है ||2||

        By - नन्दकिशोर पटेल (नंदन) study at 1st year (B.H.M.S.) S.P.H. MEDICAL COLLAGE & HOSPITAL, Chhatarpur (M.P.) mob. no. - 7000176647



add.- village & post soura , teh. chhataepur, dist. chhatarpur [m.p.]

Our Life/अपना जीवन

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इस प्रगतिशील जीवन में ,
मानव का नही ठिकाना है |
आज क्या है, क्या कल है,
ये कब, किसने जाना है ,
इस प्रगतिशील जीवन..............ठिकाना है ||1||
न अपनी मर्जी आये थे, न अपनी मर्जी जाना है |
        करलो इस जीवन को सार्थक,
                 क्योंकि,
अंत समय फिर ईश्वर में मिल जाना है,
इस प्रगतिशील जीवन..........ठिकाना है ||2||
मानव ने जीवन में इतनी उन्नती की,
कि वह हँसी-खुशी रह सकता है,
    पर कुछ कर्म किये है ऐसे
कि मानव जीवन ही संकट में पड़ सकता है |
अब दुनियां को कुछ अद्भुत करके, हमको दिखलाना है |
ऐसे परिवर्तित नव जीवन में,
कैसे संभव रह पाना है,
इस प्रगतिशील जीवन..........ठिकाना है ||3| 
         By - Ã.K. Ñandkishor                      (Ñandan®)              ( B.H.M.S. 1st Year )          S.P.H.Medical college,            chhatarpur (m.p.)