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Rakshabandhan poem / साथ काफी है...(भाई-बहन)

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भाई को बहन का साथ काफी है,
         वो उसके साथ का,
   एक अनोखा एहसास काफी है..........
        एक बहन का होना ,
 भाई के दर्द में उसका सदा रोना,
        भूल जाऊँ भला कैसे?

 रिश्ता है हमेसा साथ का उससे ,
     अनूठे एहसास का उससे,
खाली पड़े इस जीवन के चित्र में,
       बहन के हाथों डाले गए,
       वो कुछ ही रंग काफी है,
  भाई को बहन का साथ काफी है,
       वो उसके साथ का,
 एक अनोखा एहसास काफी है.......||1||
      बैठने को कंधे पर भाई के,
   पैर में चोट का बहाना बनाना,
       कुछ दूर चलकर फिर,
     वो उसका दौड़ कर जाना,
अंगूठा और जीभ दिखा-दिखा कर,
     वो उसका भाई को चिढ़ाना,
लड़ना-झगड़ना फिर हमेशा वो उसके रूठने पर,
           भाई का प्यार से उसको मनाना ,
       पकड़ कर कान फिर दोनों,
        भाई का उठा-बैठक लगाना,
रूठ कर मनाने का वो एहसास बाकी है,
    भाई को बहन का साथ काफी है,
           वो उसके साथ का,
    एक अनोखा एहसास काफी है.......||2||
                    बहन के हाथों से
 जब भाई की कलाई पर राखी बाँधी जाती है,
          मांग वचन जब अपने होने का,
            भाई पर अधिकार जताती है,
   जो हँसकर-रोक…

Father's day / पिता............. एक अहसास !

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पिता..................! मेरे पापा....
 उन्होनें मुझे हमेशा एक अच्छा निर्णायक बनने मे मदद कि वो हमेशा चाहते है कि अपने जीवन मे एक अच्छा निर्णायक बनु ताकि बुलन्दी की उस मंजिल पर पहँच सकूँ जहां से दुनिया छोटी नजर आये। परन्तु इतना ऊपर जाने से हमेसा राके रखा कि मैं दुनिया को भूल जाऊँ। उन्होने हमेशा अहसास कराया कि जीवन में हमारा लक्ष्य सदा ही आगे बढना होना चाहिए न कि किसी को नीचे गिराना। वो मुझे हमेसा अपने पास बैठा कर समझाया करते है कि कब क्या करना है क्या नही करना है या युँ कहें कि एक तरह से मेरी इच्छाओं पर पाबंदी लगाते है। उस समय ये पाबंदी मुझे किसी सजा से कम न लगती थी। लेकिन मैं जब भी कुछ करने मे असहज महसूस करता हुँ, उस समय उनकी सिखायीं हुईं बाते मुझे हमेसा आत्मविश्वास और उनके साथ होने का अहसास दिलाती है। मैं जब भी किसी प्रतियोगिता को जीत कर आता तो उसकी खुशी शायद मेरे पापा से ज्यादा किसी को न होती थी। उनका साथ होने से मैं कभी हार कर भी नही हारता हुँ, क्योंकि उन्होने मुझे हार मे जीत की अद्भुत कला जो सिखा दी। वो मुझे छोटी-छोटी गलतियों पर हमेशा डांट करते है। परन्तु एक पापा ही है जो हमारे लिय…

Maa/माँ (ममता की मूरत)/For Mother

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प्यासे को नदिया है,डूबे को किनारा है
माँ ममता की मूरत है, स्नेह की बहती धारा है||

    पकड़ के उँगली माँ की हमने,
       पहला कदम बढ़ाया है|
    जब भी भूख लगी बचपन में,
उसने ही अपना स्तनपान कराया है|
      जब-जब हम गिरे धरा पर,
          उसने हमें उठाया है|
        निश्चय बचपन में हमने,
         माँ को बहुत सताया है|
        हमने उसे रुलाया लेेकिन,
           उसने हमें हँसाया है|
        मैंने बैठ उसी की गोदी में,
       जीवन का अनुभव पाया है|
      इस दुनिया की तपती माया में,
         माँ एक शीतल छाया है|
    प्रथ्वी तो क्या,सम्पूर्ण लोको में,
  माँ का किरदार ही सबसे न्यारा है|

प्यासे को नदिया है,डूबे को किनारा है
माँ ममता की मूरत है, स्नेह की बहती धारा है||1||

    उसके चरण कमल की धूल लगा,
        हो जाता पावन माथा है|
       सागर को स्याही बना लें,
        वृक्षों की कलमें लगा लें,
       अम्बर भी कम पड़ जाये,
 लिखने को, इतनी उसकी गाथा है|
     येनन्दनतो एक बालक है,
   दाता भी गाता जिसकी गाथा है|
  ईश्वर भी बारम्बार जन्म धरा पर लेता,
                   क्योकि,
 उसको भी अांचल माँ का प्या…

मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है |

मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है |

            भरी जवानी में,

        जो बेटा-बेटा करते थे,

          अपने दुखी बुढ़पे मे,

उनके बेटों को सुख से सोते देखा है |

   नफरत करते थे, जिस बेटी से,

  आज रात उसे, उनके सिरहाने
        बैठा रोते देखा है |

मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है ||1||

व्याह हुआ ससुराल गई,

अनजानों में वहां लुटाने , वो अपना प्यार गई,

वीरानों में खड़ा किया, उसने अपना मधुवन है ,

अनजानों से भी उसे, कितना अपनापन है |

फिर भी नहीं पूछता कोई क्या उसका मन है,

        उसके मुस्काते चहरे में,

   मैंने उसके एकाकीपन को देखा है |

   मैंने बेटी में कुछ अद्भुत देखा है ||2||

        By - नन्दकिशोर पटेल (नंदन) study at 1st year (B.H.M.S.) S.P.H. MEDICAL COLLAGE & HOSPITAL, Chhatarpur (M.P.) mob. no. - 7000176647



add.- village & post soura , teh. chhataepur, dist. chhatarpur [m.p.]

Our Life/अपना जीवन

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इस प्रगतिशील जीवन में ,
मानव का नही ठिकाना है |
आज क्या है, क्या कल है,
ये कब, किसने जाना है ,
इस प्रगतिशील जीवन..............ठिकाना है ||1||
न अपनी मर्जी आये थे, न अपनी मर्जी जाना है |
        करलो इस जीवन को सार्थक,
                 क्योंकि,
अंत समय फिर ईश्वर में मिल जाना है,
इस प्रगतिशील जीवन..........ठिकाना है ||2||
मानव ने जीवन में इतनी उन्नती की,
कि वह हँसी-खुशी रह सकता है,
    पर कुछ कर्म किये है ऐसे
कि मानव जीवन ही संकट में पड़ सकता है |
अब दुनियां को कुछ अद्भुत करके, हमको दिखलाना है |
ऐसे परिवर्तित नव जीवन में,
कैसे संभव रह पाना है,
इस प्रगतिशील जीवन..........ठिकाना है ||3| 
         By - Ã.K. Ñandkishor                      (Ñandan®)              ( B.H.M.S. 1st Year )          S.P.H.Medical college,            chhatarpur (m.p.)